Tuesday, January 28, 2014

ब्राह्मणों को वैदिक एवं पौराणिक शिक्षा देना हमारा मूल उदेश्य हैं।

ब्राह्मणों को वैदिक एवं पौराणिक शिक्षा देना हमारा मूल उदेश्य हैं।

ब्राह्मण समाज का इतिहास प्राचीन भारत के वैदिक धर्म से आरंभ होता है| "मनु-स्मॄति" के अनुसार आर्यवर्त वैदिक लोगों की भूमि है | ब्राह्मण व्यवहार का मुख्य स्रोत वेद हैं | ब्राह्मणों के सभी सम्प्रदाय वेदों से प्रेरणा लेते हैं | पारंपरिक तौर पर यह विश्वास है कि वेद अपौरुषेय ( किसी मानव/देवता ने नहीं लिखे ) तथा अनादि हैं, बल्कि अनादि सत्य का प्राकट्य है जिनकी वैधता शाश्वत है | वेदों को श्रुति माना जाता है ( श्रवण हेतु , जो मौखिक परंपरा का द्योतक है ) |चित्त पर नियन्त्रण, इन्द्रियों पर नियन्त्रण, शुचिता, धैर्य, सरलता, एकाग्रता तथा ज्ञान-विज्ञान में विश्वास | वस्तुतः ब्राह्मण को जन्म से शूद्र कहा है । यहाँ ब्राह्मण को क्रियासे बताया है । ब्रह्म का ज्ञान जरुरी है । केवल ब्राहमण के यहाँ पैदा होने से वह नाममात्र का ब्राहमण होता है व शूद्र के समान ब्राहमणयोग्य कृत्यों से वंचित होता है, उपनयन-संस्कार के बाद ही पूरी तरह ब्राहमण बन कर ब्राहमणयोग्य कृत्यों का अधिकारी होता है।
निम्न श्लोकानुसार एक ब्राह्मण के छह कर्त्तव्य इस प्रकार हैंअध्यापनम् अध्ययनम् यज्ञम् यज्ञानम् तथा | ,

दानम् प्रतिग्रहम् चैव ब्राह्मणानामकल्पयात ||
शिक्षण, अध्ययन, यज्ञ करना , यज्ञ कराना , दान लेना ब्राह्मण के कर्त्तव्य हैं |
ब्राह्मण ( विप्र, द्विज, द्विजोत्तम, भूसुर ) यह आर्योंकी समाजव्‍यवस्‍था अर्थात वर्णव्‍यवस्‍था का सबसे उपरका वर्ण है | भारत के सामाजिक बदलाव के इतिहास में जब भारतीय समाज को हिन्‍दू के रुप में संबोधित किया जाने लगा तब ब्राह्मण यह वर्ण जाति में भी परि‍वर्तित हो गया | अब यह ब्राह्मण वर्ण हिन्दू समाज की एक जाति भी है | ब्राह्मण को विद्वान, सभ्य और शिष्ट माना जाता है।

ब्राह्मण वैदिक संस्कृति का पोषक व संरक्षक ही नहीं संपूर्ण राष्ट्र का स्वस्ति वाचक है ।

ब्राह्मण वैदिक संस्कृति का पोषक व संरक्षक ही नहीं संपूर्ण राष्ट्र का स्वस्ति वाचक है ।

संस्था हिमालय से लेकर कन्याकुमारी तक विभिन्न देशों में बसे संपूर्ण ब्राह्माण वर्ग का कल्याण बिना किसी भेदभाव से करती आ रही है।अपने सीमित संसाधनों से परिषद समय-समय पर सामूहिक यज्ञोपवीत संस्कार समारोह, वैवाहिक संयोजन का आयोजन, वैदिक पत्रिका का संपादन, विद्वानों का सम्मान, प्रतिभा सम्मान, श्रावणी उपाक्रम एवं ऋषि व यज्ञोपवीत पूजन समारोह का आयोजन, निश्शुल्क चिकित्सा शिविर का आयोजन, महिला प्रकोष्ठ द्वारा अनाथ महिलाओं की सहायता आदि कार्यक्रम का संपादन करते हुए समाज को एक दिशा देने व मूलभूत संस्कारों को जी
वंत बनाए रखने के लिए प्रयासरत है।
ब्राह्मण सदैव ही सत्य एवं ज्ञान की रक्षा के लिए तत्पर रहें हैं - चाहे वो वैदिक मीमांसा हो, या रावण रचित गणित सूत्र या फिर चाणक्य द्वारा राष्ट्र निर्माण ...यहाँ तक कि ब्राह्मणों ने हिदुत्व के बहार निकलकर बौध , जैन , सिख और इस्लाम (हुसैनी ब्राह्मण के रूप में ) सत्य की रक्षा की हैं। 
यह ब्राह्मणों का निष्कपट, निर्पंथ, निर्मल, शांत प्रिय, आत्म-संयामी, सत्य-अन्वेषी एवं ज्ञान पिपासु स्वभाव ही रहा होगा जिसने डॉ. ऑलिवर वेन्डेल होल्म्स सीनियर को अपने समाज के संभ्रांत सदस्यों के लिए "बोस्टन ब्राह्मण" जैसे शब्दों के चयन को मजबूर किया होगा।

ब्राह्मण वैदिक संस्कृति का पोषक व संरक्षक ही नहीं संपूर्ण राष्ट्र का स्वस्ति वाचक है ।

ब्राह्मण जाति नहीं उच्च संस्कृति है

ब्राह्मण जाति नहीं उच्च संस्कृति है

ब्राह्मण सदैव ही सत्य एवं ज्ञान की रक्षा के लिए तत्पर रहें हैं - चाहे वो वैदिक मीमांसा हो, या रावण रचित गणित सूत्र या फिर चाणक्य द्वारा राष्ट्र निर्माण ...यहाँ तक कि ब्राह्मणों ने हिदुत्व के बहार निकलकर बौध , जैन , सिख और इस्लाम (हुसैनी ब्राह्मण के रूप में ) सत्य की रक्षा की हैं। 
यह ब्राह्मणों का निष्कपट, निर्पंथ, निर्मल, शांत प्रिय, आत्म-संयामी, सत्य-अन्वेषी एवं ज्ञान पिपासु स्वभाव ही रहा होगा जिसने डॉ. ऑलिवर वेन्डेल होल्म्स सीनियर को अपने समाज के संभ्रांत सदस्यों के लिए "बोस्टन ब्राह्मण" जैसे शब्दों के चयन को मजबूर किया होगा।

ब्राह्मण को लोग जाति के नाम से जानते हैं और बहुत संकीर्णता की दृष्टि से देखते तथा जातिवादी समझते हैं । परंतु यह मिथ्या है, असत्य है । ब्राह्मण तो अति उदार, दयालु परोपकारी है। स्वत: भूखा रहकर अतिथि व भूखे का पेट भरता है। शरणागति को स्वत: का प्राण देकर उसकी रक्षा करता है। स्वत: कुटिया में रहकर राज्य का मार्ग दर्शन करता है जनता जनार्दन की सुख की चिंता कर उचित राजनीति बनाता है और समय समय पर उचित सलाह देता है । हमारे ऋषि मुनि, जंगल में रहकर मानव हित में कितना ज्ञान, विज्ञान दिया। उनकी नीतियां उच्च साहित्य वेद पुराणों में है जो आज भी कल्याणकारी है ।
ब्राह्मण ( विप्र, द्विज, द्विजोत्तम, भूसुर ) यह आर्योंकी समाजव्‍यवस्‍था अर्थात वर्णव्‍यवस्‍था का सबसे उपरका वर्ण है | भारत के सामाजिक बदलाव के इतिहास में जब भारतीय समाज को हिन्‍दू के रुप में संबोधित किया जाने लगा तब ब्राह्मण यह वर्ण जाति में भी परि‍वर्तित हो गया | अब यह ब्राह्मण वर्ण हिन्दू समाज की एक जाति भी है | ब्राह्मण को विद्वान, सभ्य और शिष्ट माना जाता है।
यस्क मुनि की निरुक्त के अनुसार - ब्रह्म जानाति ब्राह्मण: -- ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म ( अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान ) को जानता है। अतः ब्राह्मण का अर्थ है - "ईश्वर ज्ञाता" | किन्तु हिन्दू समाज में एतिहासिक स्थिति यह रही है कि पारंपरिक पुजारी तथा पंडित ही ब्राह्मण होते हैं ।