Tuesday, January 28, 2014

ब्राह्मण जाति नहीं उच्च संस्कृति है

ब्राह्मण जाति नहीं उच्च संस्कृति है

ब्राह्मण सदैव ही सत्य एवं ज्ञान की रक्षा के लिए तत्पर रहें हैं - चाहे वो वैदिक मीमांसा हो, या रावण रचित गणित सूत्र या फिर चाणक्य द्वारा राष्ट्र निर्माण ...यहाँ तक कि ब्राह्मणों ने हिदुत्व के बहार निकलकर बौध , जैन , सिख और इस्लाम (हुसैनी ब्राह्मण के रूप में ) सत्य की रक्षा की हैं। 
यह ब्राह्मणों का निष्कपट, निर्पंथ, निर्मल, शांत प्रिय, आत्म-संयामी, सत्य-अन्वेषी एवं ज्ञान पिपासु स्वभाव ही रहा होगा जिसने डॉ. ऑलिवर वेन्डेल होल्म्स सीनियर को अपने समाज के संभ्रांत सदस्यों के लिए "बोस्टन ब्राह्मण" जैसे शब्दों के चयन को मजबूर किया होगा।

ब्राह्मण को लोग जाति के नाम से जानते हैं और बहुत संकीर्णता की दृष्टि से देखते तथा जातिवादी समझते हैं । परंतु यह मिथ्या है, असत्य है । ब्राह्मण तो अति उदार, दयालु परोपकारी है। स्वत: भूखा रहकर अतिथि व भूखे का पेट भरता है। शरणागति को स्वत: का प्राण देकर उसकी रक्षा करता है। स्वत: कुटिया में रहकर राज्य का मार्ग दर्शन करता है जनता जनार्दन की सुख की चिंता कर उचित राजनीति बनाता है और समय समय पर उचित सलाह देता है । हमारे ऋषि मुनि, जंगल में रहकर मानव हित में कितना ज्ञान, विज्ञान दिया। उनकी नीतियां उच्च साहित्य वेद पुराणों में है जो आज भी कल्याणकारी है ।
ब्राह्मण ( विप्र, द्विज, द्विजोत्तम, भूसुर ) यह आर्योंकी समाजव्‍यवस्‍था अर्थात वर्णव्‍यवस्‍था का सबसे उपरका वर्ण है | भारत के सामाजिक बदलाव के इतिहास में जब भारतीय समाज को हिन्‍दू के रुप में संबोधित किया जाने लगा तब ब्राह्मण यह वर्ण जाति में भी परि‍वर्तित हो गया | अब यह ब्राह्मण वर्ण हिन्दू समाज की एक जाति भी है | ब्राह्मण को विद्वान, सभ्य और शिष्ट माना जाता है।
यस्क मुनि की निरुक्त के अनुसार - ब्रह्म जानाति ब्राह्मण: -- ब्राह्मण वह है जो ब्रह्म ( अंतिम सत्य, ईश्वर या परम ज्ञान ) को जानता है। अतः ब्राह्मण का अर्थ है - "ईश्वर ज्ञाता" | किन्तु हिन्दू समाज में एतिहासिक स्थिति यह रही है कि पारंपरिक पुजारी तथा पंडित ही ब्राह्मण होते हैं ।

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